Guru Purnima 2021 : कब है गुरु पूर्णिमा ? जाने गुरु-शिष्य की रोचक कथाएं

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) के दिन ही महाभारत (Mahabharat) के रचयिता महान ऋषि वेद व्यास (Ved Vyas) का जन्म हुआ था, यही वजह है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा (Vyas Purnima) भी कहा जाता है. वहीं गुरु पूर्णिमा के दिन लोग ऋषि वेद व्यास, अपने गुरु, इष्ट और आराध्य देवताओं की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. देशभर में सनातन धर्म के लोग इसे धूमधाम से मनाते है.

वहीं बता दे कि हमारे देश की प्राचीन परंपरा में गुरू को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. गुरू की महिमा ऐसी है कि उन्हें मात-पिता और ईश्वर से भी बड़ा दर्जा मिला है. पौराणिक ग्रंथों की मानें तो ऋषि विश्वामित्र, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि सांदीपनी, ऋषि परशुराम ऐसे गुरू हुए हैं जिन्होंने पृथ्वी पर अवतार लेने वाले ईश्वर को भी शिक्षण दिया.

वहीं ज्ञात हो कि गुरू के सम्मान में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा मनाई जाती है. वहीं इस साल गुरू पूर्णिमा 24 जुलाई को मनाया जायेगा.

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पढ़िए गुरु-शिष्य संबंधों पर पौराणिक कथाएं.

एकलव्य-गुरू द्रोण की कथा :

इस कथा में एकलव्य नामक एक बालक ने महान गुरू द्रोणाचार्य को अपने मन में ही अपना गुरू मान लिया और उनकी पाषाण प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास शुरू कर दिया. वहीं इस प्रकार वह एक बेहतरीन धनुर्धर बन गया, और जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या का अभ्यास करते देखा तो वो चौंक गए. द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांगा और एकलव्य ने उनके चरणों में अपना अंगूठा अर्पित कर दिया.

आरुणि की गुरू भक्ति :

आरुणि, ऋषि आयोदधौम्य का शिष्य था. वहीं एक बार ऋषि आयोदधौम्य ने आरुणि को खेत में मेड़ की जांच करने भेजा. वहीं उस समय आरुणि ने दिखा कि मेड़ एक ओर से टूट गई है और वहां से पानी बह रहा था. तब ही आरुणि ने मेड़ बनाने का प्रयत्न किया लेकिन लगातार हो रही वर्षा के वजह से वो मेड़ बनाने में सफल नहीं हो पा रहा था. वहीं इसके बाद आरुणि ने गुरू के आदेश के पालन करते हुए खेत की मेड़ पर इस प्रकार लेट गया कि पानी बहने से रुक जाए. कई घंटे तक वो इसी प्रकार लेटा रहा. बाद में जब आचार्य आयोदधौम्य और दूसरे शिष्य आरुणि को ढूंढते हुए खेत पहुंचे तो आरुणि की गुरूभक्ति देख आश्चर्य में पड़ गए और इसके बाद आचार्य ने आरुणि को अपने ह्रदय से लगा लिया.

कर्ण-परशुराम कथा :

उस समय गुरू परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे और कर्ण की पहचान सूतपुत्र की थी. ऐसे में कर्ण ने झूठ बोलकर ब्राह्मण के रूप में परिचय दिया. वहीं एक दिन जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे, तब एक कीट आकर कर्ण की जंघा पर काटने लगा. वहीं गुरू के विश्राम में कोई परेशानी न हो इसलिए कर्ण ने अपनी जंघा को नहीं हिलाया. कीट कर्ण की जंघा को कुरेद रहा था, जिसके वजह से उसका रक्त तेजी से बहने लगा. वहीं जब गुरू परशुराम की नींद खुल तो पहले वे कर्ण की गुरू भक्ति से काफी प्रसन्न हुए थे, लेकिन फिर उन्होंने कहा- कि“कोई ब्राह्मण इतनी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, सत्य बता तू कौन है.” कर्ण की चोरी पकड़ी गई और गुस्से में परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि झूठ बोलकर हासिल की गई विद्या को वह उस समय भूल जाएगा जब उसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी.

द्रोणाचार्य के आदेश पर अर्जुन का लक्ष्यवेध :

कौरव व पांडव राजकुमारों के गुरू द्रोणाचार्य थे. एक बार गुरू द्रोणाचार्य ने अपने गुरुकुल में एक ऊंचे वृक्ष पर नकली पक्षी बांध दिया और अपने शिष्यों से पक्षी की आंख पर निशाना साधने को कहा. जिसके बाद उन्होंने अपने सभी राजकुमारों से पूछा कि उन्हें क्या दिखाई दे रहा है. सभी ने वृक्ष, पक्षी, आकाश, पत्ते, शाखें दिखाई देने की बात कहीं, लेकिन अर्जुन ने कहा कि मुझे केवल वह लक्ष्य दिखाई दे रहा है, जिसे निशाना बनाने के लिए आपने आदेश दिया है, यानि पक्षी की आंख. गुरू अपने शिष्य अर्जुन के इस उत्तर से अति प्रसन्न हुए.

गुरू की आज्ञा से उनके ही साथ युद्ध करने के लिए राजी हुए भीष्म :

काशीराज की कन्या अंबा गुरू परशुराम की शरण में पहुंची और उन्होंने गुरू परशुराम से कहा कि आपके शिष्य भीष्म ने मेरा लगन मंडप से हरण कर लिया है, पर अब वो मुझसे विवाह करने को तैयार नहीं है. परशुराम ने भीष्म को बुलाया और कहा कि वो अंबा से विवाह करले. लेकिन भीष्म ने इस बात से मना कर दिया, जिसके बाद परशुराम ने कहा- “फिर मुझसे युद्ध करो.”. भीष्म अपने ही गुरू से युद्ध करने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन परशुराम ने इसे गुरुआज्ञा कहा. ऐसे में भीष्म के पास अपने गुरू से युद्ध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. गुरू की आज्ञा पर भीष्म ने गुरू के साथ ही युद्ध किया. कई दिनों तक चला भीष्म-परशुराम युद्ध बिना परिणाम के ही समाप्त हो गया.

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