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 OSHO RAJNEESH का जीवन जितना रहस्यमयी था, उतनी ही उनकी मौत भी। 

10 May 2021

By Suman Sharma

11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में उनका जन्म हुआ था। जन्म के वक्त उनका नाम चंद्रमोहन जैन था। उन्होंने अपनी पढ़ाई जबलपुर में पूरी की और बाद में वो जबलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम करने लगे।

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ओशो का शुरुआती जीवन

उन्होंने अलग-अलग धर्म और विचारधारा पर देश भर में प्रवचन देना शुरू किया। प्रवचन के साथ ध्यान शिविर भी आयोजित करना शुरू कर दिया।  शुरुआती दौर में उन्हें आचार्य रजनीश के तौर पर जाना जाता था।

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नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने नवसंन्यास आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने खुद को ओशो कहना शुरू कर दिया।

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साल 1981 से 1985 के बीच वो अमरीका चले गए। अमरीकी प्रांत ओरेगॉन में उन्होंने आश्रम की स्थापना की. ये आश्रम 65 हज़ार एकड़ में फैला था।

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अमरीका प्रवास

ओशो का अमरीका प्रवास बेहद विवादास्पद रहा। महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस कारें, डिजाइनर कपड़ों की वजह से वे हमेशा चर्चा में रहे। इसके बाद 1985 वे भारत वापस लौट आए।

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भारत लौटने के बाद वे पुणे के कोरेगांव पार्क इलाके में स्थित अपने आश्रम में लौट आए। उनकी मृत्यु 19 जनवरी, 1990 में हो गई।

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ओशो की मृत्यु

उनकी मौत के बाद पुणे आश्रम का नियंत्रण ओशो के क़रीबी शिष्यों ने अपने हाथ में ले लिया। आश्रम की संपत्ति करोड़ों रुपये की मानी जाती है और इस बात को लेकर उनके शिष्यों के बीच विवाद भी है।

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ओशो का डेथ सर्टिफिकेट जारी करने वाले डॉक्टर गोकुल गोकाणी लंबे समय तक उनकी मौत के कारणों पर खामोश रहे। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र पर उनसे ग़लत जानकारी देकर दस्तख़त लिए गए।

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अब डॉक्टर गोकुल गोकाणी ने योगेश ठक्कर के केस में अपनी तरफ से शपथपत्र दाखिल किया है। उनका कहना है कि ओशो की मौत के सालों बाद भी कई सवालों के जवाब नहीं मिल रहे थे और मौत के कारणों को लेकर रहस्य बरक़रार है।

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योगेश ठक्कर का दावा है कि उनके आश्रम की संपत्ति हज़ारों करोड़ रुपये है और किताबों और अन्य चीज़ों से क़रीब 100 करोड़ रुपये रॉयल्टी मिलती है। ओशो की विरासत पर ओशो इंटरनेशनल का नियंत्रण है। ओशो इंटरनेशन की दलील है कि उन्हें ओशो की विरासत वसीयत से मिली है।

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ओशो की वसीयत

ओशो इंटरनेशनल ने यूरोप में ओशो नाम का ट्रेड मार्क ले रखा है। इस ट्रेड मार्क को एक दूसरी संस्था ओशो लोटस कम्यून ने चुनौती दी थी। बीते साल 11 अक्टूबर को जनरल कोर्ट ऑफ़ यूरोपीयन यूनियन ने ओशो इंटरनेशनल के पक्ष में अपना फ़ैसला सुनाया।

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ओशो पर ट्रेड मार्क

लेकिन ओशो ने ख़ुद ही कभी कहा था कि कॉपीराइट वस्तुओं और चीज़ों का तो हो सकता है लेकिन विचारों का नहीं। पुणे स्थित उनकी समाधि पर लिखी इस बात से ओशो की अहमियत का अंदाजा लगा सकते है, "न कभी जन्मे, न कभी मरे। वे धरती पर 11 दिसंबर, 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच आए थे."

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