By Anupriya Choubey 

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7 April 2021

बॉम्बे बेगम रिव्यू : बादशाहों से टक्कर लेती बेगमों का छलका दर्द

डिजिटल रिव्यू: बॉम्बे बेगम्स (वेब सीरीज) लेखक, निर्देशक: अलंकृता श्रीवास्तव, बोरनिला चटर्जी कलाकार: पूजा भट्ट, शहाना गोस्वामी, अमृता सुभाष, प्लाबिता बोरठाकुर, आध्या आनंद, दानिश हुसैन, राहुल बोस और मनीष चौधरी आदि। ओटीटी: नेटफ्लिक्स रेटिंग: **

नेटफ्लिक्स नई वेब सीरीज ‘बॉम्बे बेगम्स’। जैसा कि नाम से जाहिर है ये सीरीज आज के मुंबइया जीवन सी कम और फिल्मों में दिखने वाले बंबइया स्टाइल जैसी ज्यादा है। ताश के 52 पत्तों जैसी सोसाइटी की चार बेगमों की ये कहानी है।

शो बॉम्बे की पांच महिलाओं पर आधारित है. ये महिलाएं उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर हैं और जिंदगी से इनकी अलग ख्वाहिशें हैं, लेकिन फिर भी कुछ बातें हैं जो सभी की जिंदगी में एक जैसी हैं.

यहां पांच नायिकाएं हैं. एक लिली (अमृता सुभाष) को छोड़ें तो बाकी चार कॉरपोरेट जगत, अमीर और उच्च मध्यमवर्गीय जीवन जीती हैं. लिली जिस्मफरोशी के पेशे में है मगर अपने लिए इज्जत और बेटे को जीवन में आगे बढ़ते देखना चाहती है. कॉरपोरेट की महिलाएं महत्वाकांक्षी हैं.

‘बॉम्बे बेगम्स’ की बेगमें सामान्य स्त्रियों से बिल्कुल जुदा, हैरान-परेशान हैं. उनके जीवन में कुछ ठीक नहीं चलता. हर किरदार उलझा, जटिल और असहज है.

कॉरपोरेट बीवियां विवाहेतर संबंधों में लिप्त हैं और फ्रेशर लड़की अपनी सेक्सुएलिटी को लेकर असमंजस में है. वह समलैंगिक संबंध बनाती है और अपने पुरुष सह-कर्मी के साथ लिव-इन में रहती है. तर्क यह कि वह खुद को तलाश कर रही है.

मुख्य कहानी रानी सिंह ईरानी (पूजा भट्ट) की है, जो रॉयल बैंक ऑफ बॉम्बे की नई सीईओ नियुक्त हुई है. उसे बैंक को कमजोर स्थिति से उबार कर मजबूत बनाना है.

कॉरपोरेट दुनिया में बढ़ती महिलाओं की यह कहानी मी-टू पर अटक जाती है.

वह इस धारणा को पक्का करती है कि कॉरपोरेट में सफल हर स्त्री के पीछे मी-टू है. भले ही उसने मुंह नहीं खोला. 

अलंकृता श्रीवास्तव गंभीर स्त्री विमर्श की फिल्में बना चुकी हैं, मगर इस बार उन्होंने बाजार से हाथ मिला लिया. बॉम्बे बेगम्स स्त्री-देह की बातों के इर्द-गिर्द ही घूमती है.

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